Thursday, July 26, 2012

निर्दोषों का देश हमारा

इस देश में निर्दोषों की कमी नहीं है, एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं । कमी है तो सिर्फ दोषियों की! एक  ढूंढो तो ससुरा आधा भी नहीं मिलता । चौथाई तक मिलकर नहीं देता। जो देखो वाही निर्दोष है। जिसके कपडे जितने सफ़ेद हैं,  उजले हैं, भगवा हैं। वह उतना ही ज्यादा निर्दोष है । नरसंहार  किया है ? कोई बात नहीं साहब आपने तो यह काम हिन्दू हित में किया है, आप तो शर्तिया निर्दोष हैं। आप बलात्कारी हैं? अरे, गारेंटी है की आप निर्दोष हैं । यह तो सामान्य बात है। रिश्वतखोरी करना तो खैर, वैसे भी कोई अपराध नहीं है। वह तो दस्तूर है, चलन है, सामाजिक व्यवहार है। अख़बार जिनका घोटाला लिखते हैं, वह भी दरअसल घोटाला  नहीं होता। उसे अंजाम देने वाले पहले भी निर्दोष थे, आज भी निर्दोष हैं, और भविष्य में भी निर्दोष रहेंगे । आप ने कमीशन खाया है तो आज की डेट मैं मंदिरों की कमी नहीं है, थोडा चढ़ावा एक मंगल का व्रत, पचाने की चूर्ण की तरह  काम करता है, पेट और चरित्र दोनों साफ़ हो जाते हैं । वैसे आप की जेब में पैसा है, आप लखपति या करोड़ पति या अरब पति हैं, तो दुनिया की कोई ताकत आपको दोषी नहीं साबित कर सकती । अदालत क्या होती है, पुलिस है जहाँ, अदालत भी क्या करे वहां। जेसिका लाल का ही मामला देखें, वो मर गयी और सब निर्दोष साबित हो गए। जेसिका लाल भद्र लोक की सदस्या थी, इसलिए थोडा हल्ला मचा, वारना हत्या हो और आप की जेब में माल हो तो कानून क्या कानून का बाप भी आप को दोषी नहीं साबित कर पायेगा।
दरअसल, हमारी इस पवित्र मातृभूमि पर दोषी सिद्ध होने के लिए इंसान को गरीब, बेरोजगार, भुकमरा होना पड़ता है । जब वो बहुतेरे हैं तो दूसरों को दोषी सिद्ध होने की क्या ज़रुरत है? बाकि तो बेचारे इतने ज्यादा निर्दोष होते हैं की जानते ही नहीं दोष क्या होता है । इस अज्ञान के कारन बेचारों से कुछ हो जाता है, तो बात अलग है। यह सही है की अज्ञान स्वयम मैं एक दोष है, वेड पुराण एइसा ही कहते हैं, मगर इतना भी बड़ा दोष नहीं है की उसकी सजा देने के लिए किसी भले आदमी को जेल में ठूस दिया जाये। यह तो सरासर अन्याय है, मानवाधिकार का हनन है! दरअसल, जिसे दोषी बताया जाता है जिस पे ऊँगली उठायी जाती है, वास्तव में उन्हें उनके विरोधी फ़साना चाहते हैं, उनका चरित्र हनन करना चाहते, ताकि वोह आगे न बढ़ सकें। वोह लाखों में खेल रहे हों तो करोड़ों में न खेल सकें, करोड़ों में खेल रहे हों तो अरबों में न खेल सकें, वो एम् एल ए हो तो मंत्री न बन सके, मंत्री हो मुख्य मंत्री न बन सके! वो अफसर हो तो कमाई को पोस्टिंग न हासिल कर सके, और कमाई की पोस्टिंग हो तो हटा दिया जाये ।
इस देश में इतने निर्दोष हैं की कभी कभी पूछने का मन करता है की, क्या वो अपनी ही हत्या के दोषी थे, जिन्हें मार दिया गया, क्या वे बचियाँ युवितयाँ औरतें ही दोषी थी, जिनके साथ बलात्कार हुआ? क्या वो ही लुटेरे थे जो लूट लिए गए, अगर उन्हें मारने वाले सभी निर्दोष हैं तो वोह मरे कैसे? दिल्ली में सिखों और गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार का दोषी जब कोई है नहीं है, तो दोषी चले कहाँ गए? या लोग मरे ही नहीं थे ? वैसे आच्छा हुआ की महात्मा गाँधी की हत्या भी आज़ादी मिलने के कुछ दिनों बाद ही हो गयी थी अगर आज होती तो गांधीजी भी अपनी हत्या के लिए दोषी ठहराए जाते क्योंकि उन्हों ने नाथूराम गोडसे को हत्या करने के लिए उत्तेजित किया था और गोडसे निर्दोष करार दिया जाता ।

                           

No comments:

Post a Comment